‘नमस्ते’ अथवा ‘नमस्कार’ शब्द का प्रयोग भारत में, विशेष रूप से हिन्दू धर्म में अभिवादन के रूप में किया जाता है।
क्या आपको पता है की इस छोटे से शब्द के पीछे क्या गूढ़ तथ्य छिपा है?
नमस्ते दरअसल एक संस्कृत शब्द है जो २ शब्दों के मेल से बना है-
नमस्ते = नमः + ते
नमः = झुकना, अभिवादन, आराधना
ते = आपको
‘नमस्ते’ का शाब्दिक अर्थ:
“मैं आपको प्रणाम / नमन करता/करती हूँ।”
इसी तरह,
नमस्कार = नमः + कार (करना)
अर्थ:
“आप सभी को प्रणाम / नमन।”
अथवा
“मैं आप सभी को प्रणाम / नमन करता/करती हूँ।”
साधारणतः ‘नमस्कार’ शब्द का प्रयोग एकाधिक व्यक्तियों के लिए, तथा ‘नमस्ते’ का प्रयोग एक व्यक्ति के लिए किया जाता है।
ये तो हो गया ‘नमस्ते’ शब्द का साधारण अर्थ, जो अभी लोग जानते हैं।
परन्तु हमारे पवित्र ग्रंथों में ‘नमस्ते’ का और गहरा अर्थ बताया गया है। वेदों में बताया गया है, ‘नमस्ते’ का अर्थ है-
"मैं आपके अंदर की दिव्यता को प्रणाम करता हूँ।"
अर्थात, हर व्यक्ति एक दिव्य सत्ता (Divine Being) है, और वह सामने वाले के अंदर की दिव्य सत्ता का अभिवादन कर रहा है।
योगशास्त्र में एक मुद्रा है- 'अंजलि मुद्रा'। जब हम 'नमस्ते' अथवा 'नमस्कार' करते हैं, तब इसी मुद्रा का प्रयोग करते हैं।
‘अंजलि मुद्रा’ में हम दोनों हथेलियों को इस प्रकार से जोड़ते हैं ताकि दोनों हथेलियों की उँगलियों की सिरें तथा हथेलियों के उभार एक दूसरे को दबायें।
अगर ध्यान दें तो आप पायेंगे कि 'अंजलि' शब्द भी एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है- अर्पित करना, अभिवादन करना। और 'मुद्रा' का अर्थ है 'चिन्ह'। अतः अंजलि मुद्रा का अर्थ हुआ: नमस्ते या अभिवादन करने का चिन्ह या तरीका।
प्राणिक हीलिंग एवं अर्हतिक योग स्कूल के Founder व आध्यात्मिक गुरु GMCKS ने अपनी लिखी हुई पुस्तक- हिन्दुइज़्म रिवील्ड (Hinduism Revealed) में उल्लेख किया है- "Namaste means - to recognize and respect the divinity within a person."
अर्थ - नमस्ते का मतलब है सामने वाले के अंदर के ईश्वरत्व को पहचानना एवं सम्मान करना।
अर्थात् जब हम किसी को नमस्ते कहते हैं तो उसे यह कहना चाहते हैं - "I Salute the Divinity Within You"
मैं आपके अंदर की दिव्यता/ईश्वरत्व को प्रणाम करता हूँ।
GMCKS ने अपनी पुस्तक में यह भी लिखा है - जब आप नमस्ते करते हैं,तो सामने वाले के सहस्रार चक्र की अपेक्षा आपका सहस्रार चक्र अधिक सक्रिय (Activate) होता है। आपको अधिक शांति , दिव्य प्रेम और दिव्य आनंद का अनुभव होता है।
लोग अक्सर बड़ों को नमस्ते करते हैं, पर हम अपने से छोटों को भी नमस्ते कर सकते हैं, क्योंकि नमस्ते हम भौतिक शरीर को नहीं, बल्कि सामने वाले की आत्मा को(सोल को), उसकी दिव्यता को करते है।
नमस्ते जब भी करें, अंजलि मुद्रा के साथ करें एवं अपने जीवन में अनिवार्य रूप से अपनाएँ तथा अपनी आगे की पीढ़ी को भी कारण सहित नमस्ते और अंजलि मुद्रा के लाभ को समझाते हुए उन्हें भी घर और बाहर नमस्ते करने की आदत(शिष्टाचार) डालें।
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